आडम्बर।।
आडंबरों का देश है,
हूं मैं भी एक मोहरा यहां।
झूठ का है बोलबाला,
सच पे पड़ा कोहरा यहां।
स्वार्थसिद्धि है चरम पर,
कौन किसको पूछता।
अंधों की ये दौड़ है बस,
स्वप्रतिबिम्ब से ही जूझता।
राजतिलक की लालसा,
है कर्म तो उत्कृष्ट नही।
ज्ञान की बातें हवा में,
है पुस्तक पर पृष्ठ नहीं।
छद्मावरण से है ढंका,
कर्णविदारक अहं का नाद है।
प्रसन्नमुख मृगमारीचिका,
मन मे बस घिरा अवसाद है।
कस्तूरी मृगनाभि बसे,
कोलाहल चहुँ ओर है।
निजमन में झांके नही,
सत्य तो निश्चय कठोर है।
है माध्यम संवादहीन,
मनोवृति अभावग्रस्त है।
सुचिता लुप्तप्राय यहां,
मनुज स्वजन से ही त्रस्त है।
मैं गढ़ रहा स्मृतिपटल पर,
क्रीड़ा नही, संदेश है।
सत्य है विचलित नही,
बस बदला सा परिवेश है।
रक्त भी स्थूल, मन्द प्रवाह है,
बहती नदी बनी पोखरा यहां।
झूठ का है बोलबाला,
सच पे पड़ा कोहरा यहां।