चलो बाँट ले आधा-आधा,
एक धूप का टुकड़ा तुम रख लो,
एक चाँद का टुकड़ा मैं रख लेता हूँ।
एक पुरानी सी किताब,
रखी है अलमारी में,
लाल रंग की जिल्द चढ़ी है,
"पश्मीने की रात"।
हर रात को तुम उसमे से एक,
पढ़कर नज़्म सुनाती थी।
फिर रख कर उसे सिराहने पे,
जूड़ा-स्टिक से बुकमार्क बनाती थी।
तो चलो बाँट ले आधा-आधा,
उन नज्मो को तुम रख लो,
वो बुकमार्क मैं रख लेता हूँ।
याद है तुमको एक दफ़ा,
मेरे सफ़ेद कुर्ते का,
एक बटन लापता हुआ था,
खोज-खबर की थी उसकी,
पर मिला नहीं था चार रोज तक।
फिर तुमने अपनी काली कुर्ती की,
बाजू से काला बटन तोड़ कर,
मेरे कुर्ते में टांका था।
तो चलो बाँट ले आधा-आधा,
वो सफ़ेद कुर्ता तुम रख लो,
वो काला बटन मैं रख लेता हूँ।
बिस्तर पर एक तकिया रखा है,
जिसे हँसी की रूई से हम,
हर मौसम भरवाता था।
2 किलो 200 ग्राम हँसी में,
वो एक मौसम तो चल ही जाता था।
आधे से थोडा सा ज्यादा, गुज़रा है ये वाला मौसम,
तभी रात में सर रखने पर हंसी सुनाई देती हैं।
तो चलो बाँट ले आधा आधा,
वो 750 ग्राम हँसी को तुम रख लो,
वो खाली तकिया मैं रख लेता हूँ।
सुबह की पहली आहट पर भी,
जब मैं नींद में डूबा रहता था।
तब नहा कर अक्सर मेरे कमरे में,
तुम दबे पाँव से आती थी।
बाल पौंछती नहीं थी तुम,
और बिस्तर के बाजू में आकर,
चेहरे पर मेरे झटकती थी।
तो चलो बाँट ले आधा आधा,
वो धुप की आहट तुम रख लो,
वो पानी की छींटे मैं रख लेता हूँ।
लोहे के पीले बक्से में,
एक ऊन का कम्बल रखा है।
जनवरी की ठंडी रातों में,
हम जिसे ओढ़ कर सोते थे।
थोडा छोटा है वो कम्बल,
तो आधा-आधा ही ढक पाता है।
पर तुम ठिठुरती थी तो,
मैं पूरा तुम्हे दे देता था।
तो चलो बाँट ले आधा-आधा,
ये ऊन का कम्बल तुम रखलो,
वो ठिठुरन मैं रख लेता हूँ।
ऐसा बहुत सा सामान है मेरे घर में,
पर उसे बाँटने में उम्र गुज़र जाएगी।
तो पहले खुद को ही बाँट देता हूँ।
तो चलो बाँट ले आधा-आधा,
मेरी रूह को तुम रखलो,
ये जिस्म का खोल मैं रख लेता हूँ।