एक शायर था कुछ 25 बरस का,
कागज़ के पन्नों पे एक दिन,
आसमां को काला,
और बर्फ को लाल लिख कर,
दूकान से स्याही लेने निकला था,
वो आज तक घर नहीं लौटा।
लगता है उस काले आसमान की छत बनाकर,
और ओढ़कर उस लाल बर्फ की रजाई को,
चिनार के किसी पेड़ के नीचे सो गया है।
के एक और कश्मीरी,
आज फिरसे वादियों में खो गया है।
एक बूढा था कुछ 72 बरस का,
वसीम चाचा चाय वाले।
छोटे से छप्पर में वो,
जेहाद नहीं कड़क चाय बनाता था।
इलायची-अदरक के टुकड़ो को,
बड़े कायदे से पीस कर,
दूध-पानी के सँग चूल्हे पे चढ़ाता था।
एक रोज एक अफसर की चाय में,
भूल से शक्कर आधा चम्मच कम डला था।
तो उस रोज से वो भी उस छप्पर से,
उन शक्कर के दानों सा कम हो गया है।
के एक और कश्मीरी आज फिरसे,
वादियों में खो गया है।
एक लड़की थी कुछ 19 बरस की,
सेब के बागों में घूमा करती थी।
एक रोज कुछ वर्दी वाले आये थे,
उसे कोठरी में लेकर गए थे,
चेहरे पे तिरंगा ओढ़कर।
और बारी-बारी वो बदलकर,
सब चढ़े थे उसके ऊपर।
दो हफ्ते हुए हैं उस हादसे को,
वो तबसे बागों में नहीं लौटी।
बस कुछ चीखें वापिस आई थी,
मेरे दरवाजे पे खटखटाने को,
उन दस्तकों का आना भी अब बंद हो गया है,
के और कश्मीरी आज फिरसे,
वादियों में खो गया है।
कुछ और चेहरे भी है,
झेलम में तैरता एक शिकारे वाला,
स्कूल जाता 8 साल का बच्चा,
इबादत में उठे दो कांपते हाथ,
और शाम में घर लौटते पँछी,
जो 1990 से अफस्पा की चादर तले सो रहे हैं,
राष्ट्रवाद के कोहरे में रोज कितने खो रहे हैं,
उन्हें ढूँढ लो, फिर से पहचान दो,
खौफ वर्दी के और बंदूकों के जरा तुम थाम लो,
वरना एक रोज ऐसा भी आएगा,
पूरा कश्मीर ही वादियों में खो जाएगा।


