
जन्नतें दोज़ख हुई है,
सुर्ख सी हैं घाटियाँ।
के एक और कश्मीरी
आज फिरसे वादियों में खो गया।
एक शायर था कुछ 25 बरस का,
कागज़ के पन्नों पे एक दिन,
आसमां को काला,
और बर्फ को लाल लिख कर,
दूकान से स्याही लेने निकला था,
वो आज तक घर नहीं लौटा।
लगता है उस काले आसमान की छत बनाकर,
और ओढ़कर उस लाल बर्फ की रजाई को,
चिनार के किसी पेड़ के नीचे सो गया है।
के एक और कश्मीरी,
आज फिरसे वादियों में खो गया है।
एक बूढा था कुछ 72 बरस का,
वसीम चाचा चाय वाले।
छोटे से छप्पर में वो,
जेहाद नहीं कड़क चाय बनाता था।
इलायची-अदरक के टुकड़ो को,
बड़े कायदे से पीस कर,
दूध-पानी के सँग चूल्हे पे चढ़ाता था।
एक रोज एक अफसर की चाय में,
भूल से शक्कर आधा चम्मच कम डला था।
तो उस रोज से वो भी उस छप्पर से,
उन शक्कर के दानों सा कम हो गया है।
के एक और कश्मी
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