जीत पढ़ूँ न हार पढ़ूँ मैं , न ज्वलंत अखबार पढ़ूँ । अमर सुमित्रानंदन की , क्या कहती पंत पुकार पढ़ूँ ।।   धर्मग्रंथ एक बार पढ़ूँ जो, कर्मग्रंथ दो बार पढ़ूँ । "खोलूँ मुख से घूँघट खोलूँ " "तारापथ" सौ बार पढ़ूँ ।। अमर ...।।