कहनी थी इक बात मगर क्या सुन सकते हो ?
मैं नित नित जीवन ज्वाला में जलता बुझता हूँ ,
क्या अंश मात्र भी दीपक सा तुम जल सकते हो ।
बादल बिजली की गरज यही संगीत मेरे हैं ,
क्या एक अंतरा तुम भी इनका सुन सकते हो ।
मैं धूप छाँव में सालों साल खड़ा रहता हूँ ,
क्या तुम दिनभर को मात्र धूप में रह सकते हो ।
मैं पतझड़ सावन और बसंत को सम जीता हूँ ,
क्या तुम जीवन को एक भाँति से जी सकते हो ।
तुम मुझे काट कर अपना स्वार्थ बना लेते हो ,
क्या रत्ती भर मेरी खातिर कुछ कर सकते हो ।
तुम मेरे जैसे लाखों का जीवन लेते हो ,
क्या जीवन भर में इक जीवन तुम दे सकते हो !
क्या जीवन भर में इक जीवन तुम दे सकते हो !
कहनी थी इक बात मगर क्या सुन सकते हो ?