☆नारी☆

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सृष्टि जो रचती बसाती

यह न हो तो

धरा गगन मध्य

कुछ कहीं नजर न आए

जितने सुनते हम किलकारी

खग,जग हो या जंगल भारी

सब संभव जब संंग ईक नारी।।

भुवन,पवन और गगन में

नजर जो आता

सबको वह जन्माने वाली

थपका थपका कदम दे देती

शब्दों से करवा देती यारी

सब संभव जब संंग ईक नारी।।

हर सीख गजब निराली

उम्र बढना रहता जारी

तब नागवार लगती बातें उसकी

पर जीवन से करवा देते यारी

सब संभव जब संंग ईक नारी।।

धरा नारी

प्रकृति नारी

भक्ति नारी

शक्ति नारी

मुक्ति नारी

युक्ति नारी

सनसनाती हवा नारी

धधकती अग्नि नारी

कुछ नही बिन ईक नारी

सजा सजीला दूनिया न्यारी

सब संभव जब संंग ईक नारी।।

✍राजीव जिया कुमार

सासाराम।