निराकार परम बर्ह्म
को साक्षी मान कर
कवि मुख से काव्य साकार
पानी जिसका रंग नहीं
जिव्हा पर स्वाद नहीं
पर इस तरल के अनेक आकार।
रिमझिम बूदों के आकार
बुलबुलों से खेलते
पाकर बच्चों सी हसीं उपहार
मल्हार राग सुन
मेघा गरजे प्यसो का प्यास
बरस बरस जैसे लगते मेले
खेतो में कमर तक ठेले
चढाते पानी का उफान
यह भी है पानी एक आकार
डूबते आँखों में सब डूबे
जो बचता सो पानी का उपहार
पानी का यह आकार।


