यूँ खुद को इतना भी न तरसाया कर कभी -कभी बारिश में भीग जाया कर... आसमा से फरिश्ते ज़मी पे नही आते, किसी इंसान से ही सब कह जाया कर... हवा खोल के खिड़की अंदर न आ पाई तो तू खुद ही छत पर चला जाया कर... हमेशा यूँ खुद को समझाना ठीक नही कभी -कभी तो मन को भी सराहा कर... नही अगर वक़्त मन की सुनने का तो खुद से नज़र नही वक़्त चुराया कर.... ज़िन्दगी में हर घड़ी एक सी नही होती, हर दौर से तू हँस के गुज़र जाया कर... कोई यँहा पर सर्व गुण सम्पन्न नही है जो भाये संग उसके ही मुस्कुराया कर... नही मिलते चाँद और तारे छूने को तो एक जुगनू को हथेली पे बिठाया कर.... जँहा चाहे वँहा न मिले गर प्यार तो, तुझे जो चाहे उसी का हो जाया कर..... यूँ मन मे रखने से कुछ नही हासिल किसी को तो राज़ सब बताया कर..... जो अपने हैं वो तो अपने ही है मगर कभी एक गैर को अपना बनाया कर... क्या हुआ जो गगन के सूरज हो तुम कभी पोखर में भी डूब के नहाया कर... लफ़्ज़ों से मन सबका मन मोह लेते हो कभी गीत खुद के लिए भी गाया कर... कोई बात अगर दिल को छू जाए तो नम पलकों से भी तो मुस्कुराया कर.... जब चहु दिशा समान और हम गुम हों तो राह पूछने से न हिचकिचाया कर... कभी किसी खास की याद सताए तो किसी मासूम बच्चे को खिलाया कर... किसी का होना या न होना तुम्हे अखरे, तो दूसरे को नही उसे ही बताया कर... नींद अगर न आये कभी रात में तो मूंद के पलकों को ख्वाब सजाया कर...