सच है चंद सिक्के किसी मुर्दे में साँस नही जोड़ सकते, फिर ये क्यों है कि मुफलिसी किसी का दम ही घोट दे. क्यूँ लोग पैसों की खातिर साँसों का व्यापार करते हैं, क्यूँ ज़िन्दगी ले के इंसानियत को शर्मसार करते हैं... ताउम्र जिस कारोबार से हमेशा नोट छापते हैं फिर क्यूँ मासूम जानें ले के भी खुदको बेकसूर आँकते हैं... तुम्हारे लाखों का मसला हो भले ही हो करोड़ों का , बच्चो ने इसकी भरपाई में दम अपना क्यों तोड़ा... अब ढूँढते रहो दुनियावालो कि कुसूर किसका था, क्या करें वो मा बाप सो गया नोनीहाल जिसका था... बदल दो ऐसी नीतियाँ जिनमे इंसान ही बस सस्ता है, मर -मर के ज़िंदा रहता है या जीने से पहले ही मरता है..