एक अन्जान जीवन राह में
एक मन... अकेला असहाय
अपनी मंज़िल को खोजता
सूनी अँधेरी राहों पर
अपनी पद्चाप सुनता
मन ही मन दुखी होता
टूटता जुड़ता यूं ही चलता....
हर चोट से जन्में दर्द को
कभी सहेजता .. कभी नकारता...
साथ सोचता चलता....
मन की पीड़ा ने तो
कविता को जन्म दिया
विश्व के दर्द को किन्तु
किसने अपना समय दिया....?
छोटा दायरा सोच का
" एक मैं और मेरा मन"
कितना सहज .. कितना सरल...
सच उस दर्द का दायरा
कितना विशाल होगा
जैसे दीपक तले अँधेरा है
तो सूरज के पीछे क्या होगा
मन की पीड़ा मनुज ने समझी
विश्व की पीड़ा का क्या होगा..?
अपने से परे ....निरंतर चलती..
अंतहीन सोच के साथ
बदलते विषय... बदलता समय
किन्तु मन वही... मनुज वही
अपने लिए आज भी
अकेला असहाय
अपनी मंज़िल को खोजता
सूनी अँधेरी राहों पर
अपनी पद्चाप सुनता
मन ही मन दुखी होता
टूटता जुड़ता यूँ ही चलता
साथ सोचता चलता
कभी कुछ अपने से परे भी ...
सोचता चलता और सिर्फ
सोचता चलता
उस अंतहीन सोच के साथ
मनुज यात्रा के अगले पड़ाव तक!!