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सिमटती शाम


थकी शाम ने ओढ़ ली देखो, काले बादल की चादर |लहरों ने फिर चुप्पी साधी, करने शाम का फिर आदर |

आसमां के माथे पे, है निखरी चाँद की बिंदिया |पवन के झोंके शाम की आँखों, मे लाते है निंदिया ||

— राजेश जोशी
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