उफ्फ, कितने वक्त ज़ाया हो गए बिन ख़्वाब होने से,

जगाना है हूनर को अब बदन के कोने कोने से,

चमकना है मुझे भी आशमां में बन के तारा अब,

 सोया था अभी तक आज़ जागा हूं बिछौने से,


          ~राजेश_काशीवासी