आओ चलो space में चलते हैं,
साहित्य, गीत, गान भरे देश में चलते हैं,
बड़ा खुशनुमा माहौल है वहां,
खुशियाँ बांटने उस रेस में चलते हैं,
आओ चलो स्पेस में चलते हैं
वहां हिंदू भी होंगे वहां मुस्लिम भी होंगे,
सिक्ख ईसाई भी होंगे,
पर ये सब कुछ भूल मानव के भेष में चलते हैं,
आओ चलो स्पेस में चलते हैं,
नए नए दोस्त जुड़ेंगे,
नए संबंधों का आगाज़ भी होगा,
दिलदारों से भरे उस परिवेश में चलते हैं,
आओ चलो स्पेस में चलते हैं,
वहां शीर्षक श्रोता और दर्शक होते हैं लाजवाब,
तन को मन को दिल को सुकून मिलता है जनाब,
तो फिर क्यों न उस स्थान विशेष में चलते हैं,
आओ चलो स्पेस में चलते हैं
~राजेश काशीवासी


