तुम आग हो,
तुम्हें सुलगना नहीं,
जलना है।
ताप देना है
सारे जहाँ को।
घुट-घुट कर साँस लेना
तुम्हारी प्रकृति नहीं।
ऊर्जा हो तुम,
युवा।
तुम्हारे रक्त की उष्णता
सिर्फ़ प्रेयसी को उन्मादित करने के लिए नहीं,
इसके बहुत से प्रयोजन हैं।
राष्ट्र, समाज,
ताक रहे हैं तुम्हारी ओर।
कब जलाओगे
भ्रष्टाचार, सांप्रदायिकता
और नफ़रत की लाश?

