बहुत शोर है चहुँ ओर,

आँखें मूँदो और सुनो ज़रा,

कदम बढ़ाओ भीतर की ओर,

जहाँ गूँजती है ध्वनि,

घर की, बच्चे की, रसोई की,

शायद बाथरूम की भी।


इन ध्वनियों को लाँघोगे जब,

तो सुनाई देंगी आवाज़ें,

नीचे स्कूटर की,

कुत्तों के भौंकने की,

कार पार्क करने की,

या फिर चौकीदार की।


इन सब को पीछे छोड़,

गहराई में उतरोगे जब,

तो सुनाई देंगी ध्वनियाँ,

मंदिर की घंटियाँ, मस्जिद से अजान,

राजमार्ग पर चलते ट्रकों की,

मेट्रो की या एम्बुलेंस की।


हवा की, आंधी की,

पेड़-पौधों की, प्रियजनों की,

जन्म की, रोग की, मृत्यु की,

ज्ञानियों की, अज्ञानियों की,

नेताओं, अभिनेताओं की

साधुओं की, संतों की।


अगले पड़ाव पे गूँजेगी,

अपने भीतर की ही आवाज़,

मन की, अंतर्मन की,

बुद्धि की, विवेक की,

करुणा की, प्रेम की।


जब कर लोगे सब पार,

गहरे काले अंधियारे में,

जहाँ सब कुछ निशब्द होगा,

बस होगा शून्य।

दिखेगी एक ज्योति,

दिखेगी नई राह ।


सारे शोर से परे,

एक नीरव पथ पर,

निकलती होंगी आत्माएँ,

अनंत की ओर,

परम सत्य की ओर,

परम ब्रह्म की ओर।