फड़क-फड़क
हुंकारती बाँहें,
आगे बढ़ा मैं सीना ताने।
दन-दन-दन-दन
मैं दाग रहा था,
दुश्मन भागम-भाग रहा था।
तड़-तड़-तड़-तड़
गन चल रही थी,
दुश्मन थर-थर काँप रहा था।
रुक-रुक-रुक-रुक,
संदेश आ गया,
दिल्ली से आदेश आ गया।
रुक गया मैं,
अब हाँफ रहा था,
गुस्से में मैं काँप रहा था।
छाती मेरी ज्यों फट रही थी,
धक-धक-धक-धक
दिल धड़क रहा था।
ख़ुद ही खुद को डाँट रहा था,
मन मेरा नहीं मान रहा था,
ख़ुद को हारा जान रहा था।
गाँव-घर में क्या बोलूँगा,
कैसे अपना मुँह खोलूँगा?
बेटे का अभिमान जा रहा था।
फफक-फफक
चुप ही नहीं होती।
मेरी माँ का मान जा रहा था।
टप-टप-टप-टप
आँसू बरसे,
भारत माँ का स्वाभिमान जा रहा था
मेरा आत्मसम्मान जा रहा था
सीजफायर का दर्द क्या होता,
बस सैनिक मन जान रहा था।
