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परछाईं हैं हम

मुनासिब नहीं है मेरा

कुछ बोलना, सिकंदर

रंजिशों के शहर में

तमाशाई हैं हम ।।


इल्तिजा इतनी है

तू सुन मेरी ख़ामोशी

नफ़रतों के बाज़ार में

सौदाई हैं हम ।।


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