मुनासिब नहीं है मेरा
कुछ बोलना, सिकंदर
रंजिशों के शहर में
तमाशाई हैं हम ।।
इल्तिजा इतनी है
तू सुन मेरी ख़ामोशी
नफ़रतों के बाज़ार में
सौदाई हैं हम ।।
कितने ज़ुल्म हुए
फ़क़त नाम के ख़ातिर
ख़ुदा के फ़ज़्ल से ही
ख़ुदाई हैं हम ।।
मरघटों में जलते हैं
क़ब्रों में दफ़न हैं “राज”
फिर क्यों ग़ुरूर इतना
परछाईं हैं हम ।।

