निशीगंधा

मैंने ओढ़ रखी है

तुम्हारी मदमाती खुशबू

शायद सदियों से।

कितनी भी महक ले लूँ

कॉफ़ी बीन्स की,

तुम ख्यालों से नहीं जाती।



निशीगंधा

कई बार होता है ऐसा,

तुम धीमे से पुकारती हो

मेरा वही नाम

जो सिर्फ़ तुम

जानती थीं या मैं,

तुम्हारा दिया हुआ नाम।

मैं उठ जाता हूँ

गहरी नींद से।


फिर लिखता हूँ

एक कविता

तुम्हारे नाम,

“निशीगंधा”,

शायद सदियों से

चला आ रहा है यह सिलसिला

साँसों से खुशबू के मेल का।


निशीगंधा

सोचकर तुम्हें

तृप्त हो जाती है

मेरी रूह,

फिर मेरी आँखें

होने लगती हैं
 उनींदी,

तुम देने लगती हो

अपने कोमल हाथों से थपकी

बिल्कुल माँ की तरह।

मैं सो जाता हूँ

तुम्हारी गोद में।