महायज्ञ
महायज्ञ है
क्यों दूर खड़े हो
आहुति डालो
जन गण की अभिलाषा
अपने स्वप्न जला लो
रोशन हो चहुं ओर
घर-घर हो उजियारा
कुल दीपक अपना
नुक्कड़ चौराहे बारो
महायज्ञ है
क्यों दूर खड़े हो
आहुति डालो
जन गण की अभिलाषा
अपने स्वप्न जला लो
वीरांगना को ना जकड़ो
जंजीरों में
उसके अंदर की दुर्गा को
बाहर निकालो
मातृभूमि की पुकार
वक़्त ललकार रहा है
व्यवस्था बदले
वो शमशीर निकालो
निकल पड़ो सड़कों
चौराहों पे
जिंदा लाशों
अपनी तुम तक़दीर निकालो
महायज्ञ है
क्यों दूर खड़े हो
आहुति डालो
जन गण की अभिलाषा
अपने स्वप्न जला लो
तू है कवि तो क्या
घर आंगन में लिखता
यज्ञभूमि में पहुँचो
वीर रस में गाओ
आसुरी शक्तियाँ
सब एकजुट हैं
निकलो बाहर साथी
अपना देश संभालो
महायज्ञ है
क्यों दूर खड़े हो
आहुति डालो
जन गण की अभिलाषा
अपने स्वप्न जला लो
