शाम ढलते ही

निकल आते हैं कुछ सांप,

अपने बिलो से,

रेंगते-रेंगते, डसने के लिए,

चूसने को रक्त की बूँद-बूँद।

काले, नीले, पीले सांप।


ज़हर की धार से

स्तब्ध हो जाते हैं वेधित अंग,

और डर से

जकड़ जाता है मस्तिष्क।


हाँ, नेवला बनना होगा

जीवित रहने के लिए।

जीना पड़ेगा लड़ने के लिए,

और लड़ना पड़ेगा जीतने के लिए।