कितने अपने मिले, पराए चले गए,

राहें बदलीं जैसे,हमराही बदल गए।

हमसफ़र भी गए, हमसाया चले गए,

रास्तों में मोड़ कितने आए, चले गए।


चलता रहा मैं — राही ,कांटों की राह पर,

सब बदला, पर मेरी मंज़िल वहीं रही।

अपनी ही धुन में, अपने गीत गाते चले गए,

तूफ़ानों के बीच से मुस्कुराते चले गए।


दर्द कम तो नहीं थे, पर छुपाते चले गए,

थककर हुए जो चूर , लड़खड़ाते चले गए।

गठरी जिम्मेदारियों की उठाकर चले गए,

खाली मुठ्ठी आए थे, हाथ पसारे चले गए।


इस आने-जाने के खेल में

एक किस्सा अजीब था —

एक अनदेखी सी परछाईं

आंखों में बसाकर चले गए।


मुमकिन नहीं ख्यालों से

जुदा होता मेरा खुदा,

हम होठों पर उसका नाम

सजाए चले गए।


जब तक समझ पाती दुनिया

मेरे अस्तित्व का सार,

बिन कुछ कहे-सुने

सबको रुलाकर चले गए।