घटाएँ घिर ही आती हैं , हवा जो रुख बदलती है ।

चमन बनता है वीराना , फुहारें जब बरसती हैं ।

सब्र से काम लो थोड़ा ,तबीयत को सँभालो तुम ।

तरन्नुम पर निगह रखकर , गजल को ना बिगाड़ो तुम ।

जरा खुलकर जो गाओगे , तराना आ ही जाएगा ।

गर कोशिश करोगे तो ,जमाना लौट आएगा ।

जीने का तेरे पास ,बहाना लौट आएगा ।

घटाएँ घिर ही आती हैं , हवा जो रुख बदलतीं हैं ।

चमन बनता है वीराना , फुहारें जब बरसती हैं ।

छोड़ो आवारापन ऐसा ,यों दर्द मत ओढ़ो ।

गर्म तपती राहों पर , नंगे पांव मत दौड़ो ।

खलिश इक खार की दिलपर , गर ना पालोगे ।

खिजां को अलविदा कहकर , बहारों को बुलालोगे ।

घटाएँ घिर ही आती हैं , हवा जो रुख बदलती है ।

चमन बनता है वीराना , फुहारें जब बरसती हैं ।

- राजीव " हैरान "