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मुसाफ़िर


कहे जा , कहे जा , दास्ताँ अपनी ,मैं सुन रहा हूँ , दास्ताँ अपनी ,

सवार हैं एक ही कश्ती के ,संग तेरे है मुसाफ़िरी अपनी ।

— राजीव " हैरान "
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