मै टुक- टुक काठ खिलौना सा।भव्य शिखर के स्वर्ण कलश तुम , मै अभ्यागत कर दौना सा।मै टुक-टुक काठ खिलौना सा । जन गण मन के तुम नर पुन्गव,मै निरीह मृग छौना सा,मै टुक-टुक काठ खिलौना सा।तुम विजयी सैन्य के गण नायक,मै अद्ना सा मै बौना सा, मै टुक-टुक काठ खिलौना सा। तुम विजयी वाहिनी शंखनाद से मै विरहन का रोना सा,मै टुक-टुक-- खिलौना सा।तुम भव्य महल हो वैभव के, मै इक सूना कोना सा,मै टुक-टुक काठ खिलौना सा।तुम जीवन के अश्वमेघ से,मै इक छोटा टोना सा,मै टुक-टुक काठ खिलौना सा।तुम जीवन के त्वरित रथी से,मै जीवन का ढोना सा,मै टुक-टुक काठ खिलौना सा।काठ खिलौना भले रहा मै-----चाहते हो उत्कर्ष जिसका,विकास और उल्लास जिसका,मै वो स्वप्न सलौना सा,मै टुक-टुक काठ खिलौना सा।चाहते हो बढ़ चलूँ मै, दीनता को छोड़ कर। ज्ञान रथ विज्ञान रथ पर, दौड़ कर मै जा चढूं,विश्व के वैभव पटल पर,त्वरा से आगे बढूँ।हाथ अपना मुझे देकर,सारथी मेरे बनो। सोचो मै स्वप्न सलौना सा, मै टुक-टुक--खिलौना सा।कर सको तो त्याग दो तुम ,आभिजात्य के अभिमान को।भूल जाओ छोड़ दो तुम त्याग के उपनाम को।कर सकोगे, भस्म कर दो,स्वार्थ को स्व्मान को।हवन कहो इस को तुम या कह लो जादू-टोना सा।मै टुक-टुक--खिलौना सा। यह कर सको तो हाँ कहो और सारथी मेरे बनो,क्यौंकि चाहते हो उत्कर्ष जिसका,विकास और उल्लास जिसका,मै वो स्वप्न सलौना सा, मै टुक-टुक काठ खिलौना सा। राजीव सैनी 'हैरान'

