मैं मदिरालय का टूटा सुरापात्र हूँ , जीवन के उत्थान पतन का संकेत मात्र हूँ , इठलाता था नित्य प्रति , मैं सुरा स्पर्श से , खनकाता था अपनी काया असीम हर्ष से , करता था अधरों का नित चुम्बन आलिंगन , सौंदर्य पुलक से भरा हुआ था मेरा जीवन , पर लिखा हुआ था भाग्य में मेरे खण्डित होना , अग्यात दोष के लिए मुझे था दण्डित होना , इक दिन मद्य प्रेमी का लहराता सा स्वर , टकराया था मेरी बिल्लौरी काया से , असमर्थ रहा बच पाने में मैं उस काली छाया से , दोषी है सुरा भी पर केवल मैं खण्डित हूँ इठलाती है सुरा लहराकर रंगीन कलेवर , पूरे दोष के लिए अकेला मैं दण्डित हूँ मैं मदिरालय का टूटा सुरा पात्र हूँ , जीवन के उत्थान पतन का संकेत मात्र हूँ ।

-राजीव " हैरान "