बहारों की अंजुमन में ,
शबनम, गुल, सबा, सभी खामोश हैं ।
बागों में वीरानों की महफिलें हैं।
शहर उदास , गलियां सूनीं हैं ।
बाजारों में वबा की झुलसाती हवा है ।
आफत की लहर पर लहर है ।
एक के बाद दूसरा कहर है ।
आदमी आदमी से दूर है ।
चेहरे ढकने को सभी मजबूर हैं ।
जाने ये जहरीला दौर कब बीतेगा ।
जब ये वबा हारेगी , इन्सान जीतेगा ।
- राजीव "हैरान"

