हिज्र में दरिया के किनारों से ,
आशिक - माशूक होते हैं ।
चाहत करके भी मिल नहीं सकते ,
वो किनारों से साथ चलते है ,
अश्कों की राह गम निकलते हैं ,
जो तन्हाइयों में दो दिल रोते हैं ।
- राजीव "हैरान"


हिज्र में दरिया के किनारों से ,
आशिक - माशूक होते हैं ।
चाहत करके भी मिल नहीं सकते ,
वो किनारों से साथ चलते है ,
अश्कों की राह गम निकलते हैं ,
जो तन्हाइयों में दो दिल रोते हैं ।
- राजीव "हैरान"