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गाँव


नहीं जानता, धूप और छाँव को ।नहीं जानता आश्रय और ठाँव को ।

जानता हूँ पगडंडियों और अपने नंगे पांव को ।जानता हूँ आज भी मैं अपने गाँव को ।

— राजीव " हैरान "
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