तुम्हारी यादों के लम्हो को पन्नो पर उकेरता
तो नज़्म बन सकती थी
पर मैने नही लिखी तुम पर कोई नज़्म
अपने अल्फाज़ो को कलम की स्याही में डुबोता
तो नज़्म बन सकती थी
पर मैने नही लिखी तुम पर कोई नज़्म
तुम्हारी मुख़लिस मुस्कुराहट पर
गले मे काले धागे में पहनी कंठी पर
खनकते कंगन, पैरो की पायल
हाथो की मेहंदी, कदमो की आहट पर
लंबी चुप्पी पर, बेहिसाब बातो पर
दूरी पर, अनगिनत मुलाकातो पर
फ़िल्म के बहाने रात भर जगना
पास बैठकर बाते करना
अपनी उंगलियों को मेरी उंगलियों में फंसाकर
छुड़ाने की नाकाम कोशिश करना
अपनी उंगलियों से तुम्हारे बदन पर
हर्फ़ दर हर्फ़ लिखना
भूख लगने पर चिप्स मंगवाना
तुम्हारी हाथो की उंगलियो का स्वाद
चिप्स के साथ इश्क़ को भी चटपटा बनाता
सोते वक्त मोबाइल स्क्रीन पर उंगलिया चलाना
मैसेज के इंतज़ार में मोबाइल में आंखे गड़ाना
सोने के बाद भी नींद नही आना
एक दूसरे को देखकर खयालो में मुस्कुराना
तुम्हारे होने के एहसास पर, फिर तुम्हारी
मौजूदगी पर
फिर भी मैन नही लिखी कोई नज़्म तुम पर
बस यही सोचकर की मेरे लिए किसी नज़्म से बड़ी हो तुम।


