सन्नाटा रातों का, आवाज़ करता कभी-कभी, कभी कुछ शांत, पर बहुत गहराई लिये, मानो किसी से टूट कर इश्क़ करने के बाद धोखा खाके शांत सा बैठ गया है, या फिर किसी के लौट आने का इंतज़ार है शायद इसे, इसलिए खामोश तो है पर बेपरवाह नहीं, न कोई आवाज़ है न कोई हरकत, थक सा गया है शायद, ये सन्नाटा ऐसा पसरा है कि चीखें खामोशियों में दफन कर दो फर्क चीखों को पड़ेगा, ख़ामोशी आज भी मायने हज़ार रखती है, ये सन्नाटा।