तेरे जाने का रंज हो क्यूँकर इक हसीं ख्वाब था जो टूट गया ज़द ब ज़द चाल ज़माने ने चली रफ्ता रफ्ता वो हमसे रूठ गया कैसे उस सम्त अब सदा जाये कैसे इस गम को अब सहा जाये और अब किसलिए जिया जाये मौत आये तो कुछ करार आये अब मेरी हद में उसके ख्वाब नहीं नींद वो जब से मेरी लूट गया अब रज़ा जीने में भी क्या होगी ज़ख्मे फुर्कत मेरी सज़ा होगी यूँ मेरा साथ जो वो छोड़ गये ये कयामत की इब्तिदा होगी ऐसा बिखरा हूँ उनकी उल्फत में जैसे आइना कोई टूट गया वस्ल के दिन नहीं रहे बाकी न कोई आस न दुआ बाकी आग जो दिल में लिये बैठे थे बुझ गई कबकी बस धुआं बाकी राख को क्यूँ कुरेदते हो तुम कोई हिस्सा क्या इसमें छूट गया तेरे जाने का रंज हो क्यूँकर इक हसीं ख्वाब था जो टूट गया