नक्श ए मुस्तकिल है ख्वाबों में तमन्ना तेरी मुस्तकिल हम भी हैं सीने पे बोझ उठाये हुये यूँ टपकता है लहू ख्वाबीदा आँखों से मेरी जैसे रिसते हों ख्वाब सीने में दफनाये हुये इश्क में चोट लगे यूँ तो बहुत देर हुई अब भी रहते हैं तेरे नाम से घबराये हुये हम मुस्लसल हैं गर्द ए ज़माना फिर भी हो गया अर्सा एक अपने ही घर आये हुये जाम कितने भी मिले प्यास बुझी न मेरी यूँ तेरी आस में हूँ अब भी लब जलाये हुये वो अब भी कहते हैं बस हर्फे मुरव्वत लेकिन हम अब भी बैठे हैं सजदे में सर झुकाये हुये समर जला न अब अंधेरों में रौशनी के चिराग यहां सभी  हैं अंधेरों से दिल लगाये हुये