खुद को बेज़ार यूँ किया जाये

चलो फिर इश्क कर लिया जाये

ऐसे जीने में भी मज़ा क्या है

ज़हर ये खुद से फिर पिया जाये

उससे अब हिज्र का रिश्ता सही

वस्ल की आस में जीया जाये

मुब्तला इश्क में हुये कुछ यूँ

ज़ख्म अश्कोंं से अब सीया जाये

इश्क़ गर कुफ्र और हम काफिर

अब नमाज़ी ही बन लिया जाये

उनपे मिटने का जनून है इसको

अब समर खाक कर दिया जाये