रात की गुमनामी में अक्स संजोता हूँ
ज्यो याद में तेरी जिंदगी को ढ़ोता हूँ
परछाईया भी अब तो पास नहीं आती
भरी दोपहरी उन राहो पे तुझे ढूंढने जो जाता हूँ
आँखों की चमक कुछ छीन सी गयी है
साँसों की धमक अब थम सी रही है
साथ जो गुज़ारे थे वो पल किसने चुराये
खता क्या हुई की तुम लौट के न आये
सवालो से घिरा खुद से भी भाग न पाता हूँ
शब्दों के भवर जाल में खो सा जाता हूँ
तुम भी तो व्यथित कही सोचती होगी
आईने को देख के पूछती होगी
जो किया था तुमने वो क़ुबूल था क्या
उस दिल को दुखाने का उसूल था क्या
क्यों संजोये थे उन आँखों में वो सपने तुमने
पराये थे जो सब हो सके न अपने
गुमनाम फिर आज तेरी दर्द संजोता हूँ
तू है ही नहीं जान के भी मान न पाता हूँ
काश उस बारिश तुझे रोक ही लेता
मक़बूल है तू ये क़ुबूल ही लेता
ना छलकते फिर ये अक्स मय के प्यालो में
"राज" जिंदगी न उलझती फिर इतने सवालो में .....
