कैसा समर
प्रतिपल तिमिर
बढ़ता ही जाता है मेरा
कोई यत्न हो के प्रयत्न हो
निष्फल ही जाता है मेरा
लाऊं मैं ऊषा खींचकर
मुठ्ठी में अपनी भींचकर
कुछ शेष है प्रारब्ध से
सरक जाता है निरा।
राजवर्धन जोशी
(are jay)


कैसा समर
प्रतिपल तिमिर
बढ़ता ही जाता है मेरा
कोई यत्न हो के प्रयत्न हो
निष्फल ही जाता है मेरा
लाऊं मैं ऊषा खींचकर
मुठ्ठी में अपनी भींचकर
कुछ शेष है प्रारब्ध से
सरक जाता है निरा।
राजवर्धन जोशी
(are jay)