जीवन फूलों की सेज नहीं
संग मन भी है बस देह नहीं
मन बस में रहे तन तन न रहे
तन मन में रहे मन मन न रहे
जीते जी हो संभव क्वचित्
मानुष हैं हम सब विदेह नहीं।
बस मन न रहे तन तन के रहे
मन तन में रहे तन मन में रहे
तन तन न रहे मन मन में रहे
संभव कैसे तन मन के रहे
तर्क निकलता शब्दों से
ऐसा मेरा उद्देश्य नहीं
सार मेरा जीवन इतना
तथ्य शेष विशेष नहीं।
राजवर्धन जोशी
(aree jay)


