मैं सब पर छा जाना चाहता हूँ,
हां मैं भी कृष्ण बन जाना चाहता हूँ।
हर लूँ मै सभी पीड़ाएं तन मन की,
भर दूं सर्वत्र सरिता जीवन प्राणों की।
दुख दरिद्रता अपंगता शिकार बन जाएं,
मुक, बघिर,अपंग वाचाल हो जाएँ।
कुमति, दुर्गति, अहंकार फटक न पाएं,
पुनःसुदामा सदृश ऐसा प्रारब्ध न लाए।
क्रोध, काम, मद, लोभ फटक न पाए,
नियंत्रित ह्रदय मात्र वायु संचरण पांए।
राजनीति की मर्यादा निर्धारित कर दूं,
कौरव-पांडवों की मनस्थिति सम कर दूं।
कर्ण को ही सर्वोत्तम आधार दिला दूं,
उसको ही वास्तविक कर्णधार बना दूं।
धृतराष्ट्र क्यों नेत्रहीन विभूषण पाए,
शकुनि भ्राता क्यों निन्दनीय हो जाए।
दृष्टि प्रदत्त ईश आभूषण कहलाए,
गांधारी किस कारण यूं शापित हो जाए।
क्यों बदले क्रम चलता समय समय पर आए,
अनुचित सा है त्रेता द्वापर से पहले क्यों आए।
युद्ध ही यदि गति है अंतिम परिणिति,
किस काज उत्पन्न हुईं प्रभु राजनीति।
क्या संभव न था टल जाता ये महायुद्ध,
मिलजुल रहते सब यदि तुम बन पाते बुध्द।
मात्र ज्ञान गीता बांचने हेतु महभारत कराई,
कर्म फल प्रारब्ध की क्यों रीति बताई।
सब नियत है तेरे हाथ सब तेरे द्वारा है,
फिर क्यों मानव जीवन भर कर्मों का मारा है।
कितनी दुविधा है क्या छोड़ क्या अपनाए,
द्वैत दृष्टि रख चले अथवा अद्वैत में मन लगाए।
बढ़ता जितना आगे भ्रम बढ़ता जाता है,
नहीं मुझे तेरा निर्मित दर्शन भाता है।
आज करूँ मैं कर्म फल बरसों बाद पाऊँ,
कर्म फल का अनुमान किस प्रकार लगाऊँ।
इस दर्शन से मैं एक दिन नया दर्शन निकालुंगा,
मानव जीवन जीने का सरल मार्ग निकालुंगा।


