कल कहां निकलेगा?

जल जहां निकलेगा

चलेगी पवन जहां

सुगंध मलय बहेगी

पत्ता पत्ता गायेगा

संग झूमेगी कलियां

भ्रमर गुनगुनाएंगे

बन पुष्प आएगा

यौवन ले रज

प्रणय होगा

पुनः ओंकार।

हां ऐसा कल होगा।

क्या ऐसा निकलेगा कल?

क्या मिल पाएगा जीवन जल?

पवन बदल तो न लेगी

दिशा रूप

द्रव या कठोर हो जाय

भुजंग लूट तो न लेंगे

सुगंध मिल सकेगी

कल पर्याप्त ऊष्मा

आर्द्रता पसीज पाए

अंकुरण भेद

धरती की छाती

मुसकाय कि डोले

पवन मगन धरती

गगन अपनी धुरी

कि ऋतु चौमास दस्तक दे

पुनः मिल पाय जल

है आस

पुनःमिल पाय कल।

राजवर्धन जोशी

(Arwe jay)