बहुत कचोटते हैं लफ्ज जो
बार बार टोकते हैं
बीती हुई कोई एक बात
कितनी बार घोटते हैं
इतना कि जब तक
न घुटने लगे दम
मिलने लगे हवा
इतनी कम
के कलेजे की धड़कन
बढ़ जाय फिर
होने लगे कम
के उड़ जाय नींद
हराम चैन सुकून
मिले कहां
या घुट ही जाय
दम सोचते हैं।
राजवर्धन जोशी
(arse jay)


