आॅक्सीजन को प्राणवायु कहा गया है
सचमुच ऐसा ही है
यह तब अच्छी तरह जान पाया
जब कोरोना-स॔क्रमित लोगों को
इसके अभाव में हांफते
एड़ियां रगड़ते,मरते देखा।
तुलसीदास की रामायण में
'चले मरुत उनचास 'का उल्लेख है
हम सभी के बारे में नहीं जानते
पवन पुत्र हनुमान को अवश्य मानते हैं ।
अमेरिका में टोरनेडो विध्वंसक वेग सै
तबाही की कहानी लिखते हैं
फिल्म 'ट्विस्टर 'देखकर
इसे समझना आसान होगा
भारत में भी यह वेरिएंट आ पहुंचा है
हम आंधी-तूफान और विनाशक
चक्रवातों पर ही निर्भर रहे हैं
वायु वेग का आघात सहने के लिए।
सागर तट की वेगवान वायु
'बच्चन 'जी के शब्दों में--
'वेग से बहता प्रभ॔जन केशपट मेरे उड़ाता '
के रूप में वर्णित है।
हवा के झकोरे आनंद की अनुभूति ,
लू के थपेड़े दुख और शीतल,म॔द,सुग॔ध
समीर तृप्ति देते हैं
कवि ने लिखा ही है--
'ललित लव॔ग लता परिशीलन
कोमल मलय समीरे।
धीर समीरे यमुनातीरे
वसति वने वनमाली गोपी '।
अंधड़ों की धूल,मिट्टी से सुरक्षित
नगरवासी हम बड़े आनंद में हैं
स्विच दबा कर फैन,एसी की हवा में
गांव की अमराइयां,सरसराते पात
पीपल,नीम के या छांव बरगद की
नहीं है फिर भी हवा तो है
प्राकृतिक हो या नहीं हो।


