क्या क्या खोया क्या क्या पाया
क्या देखा और क्या दिखलाया
करने चलो हिसाब सभी का
यौवन गया बुढ़ापा आया।
अब कोई उत्साह नहीं है
कुछ पाने की चाह नहीं है
चुप होकर के बैठ रहो अब
आगे कोई राह नहीं है।
कैसी कैसी कटी ज़िन्दगी
टुकड़े टुकड़े बँटी ज़िन्दगी
आओ सोचो अब फुर्सत में
लीक से कब कब हटी ज़िन्दगी।
सोना जगना खाना पीना
इसी को अब कहते हैं जीना
एक एक दिन गिनते गिनते
गुजर रहा हर एक महीना।
सभी इंद्रियां शिथिल हो चुकीं
रोगों की सौगात मिल चुकी
अपनी अक्षमता ढोने की
ताकत की अब नींव हिल चुकी।
