शरद पूर्णिमा का चंदा भर भर कर लायाअपने साथ उजास ढेर सीचित्त प्रफुल्लित हुआ।भूल गए हम गर्म हवा के झोंके, लू के थपेड़ेजो व्याकुल करते थे।कोमल, शीतल, मंद समीर स्पर्श कर सिहराता है।कितना सुंदर, कितना मादक लगता सब कुछ।