फिर किसी मच्छर ने काटा गाल पर
जोर का थप्पड़ लगाया गाल पर
उड़ गया मच्छर उसे बचना ही था
उंगलियों की छाप रह गई गाल पर।
मैंने सोचा रात में कुछ क्यों लिखूं
ओढ़ चादर नींद लूं कुछ क्यों लिखूं
किन्तु मच्छर की अलग ही सोच थी
काट कर समझा दिया कुछ क्यों लिखूं।
मैं सजग हूं मौन चिन्तन हो रहा
समय ऐसा है कि जग है सो रहा
यह करम मच्छर का ही है जान लो
नई रचना का सृजन है हो रहा।


