क्रांति कहीं समस्त विवशताओं से उपजे

आक्रोश का विस्फोट तो नहीं

जब आगे का रास्ता नहीं सूझता

कोई ओर छोर नहीं बचता सहनशीलता का

सभी गलत होने का आरोप लगाते हैं

मजाक उड़ाते और ठठा कर ह॔सते हुए

उंगलियाँ उठा कर।

जिनलोगों पर विश्वास कर सौंप दिया था

अपना वर्तमान और भविष्य

वे ही आज मालिक बन बैठे हैं

कुछ भी देना अपनी कृपा मान कर

भीख की तरह देना चाहते हैं

जो किसी भी प्रकार से अभीष्ट नहीं।

अब जब वे कानों में तेल डाल कर

आंखों में रंगीन चश्मा लगा कर बैठ चुके हैं

कोई उम्मीद बाकी नहीं बचती

मरना हर हाल में है।

अस्तु आओ कुछ नया करें

परिवर्तन सृष्टि का नियम है

इसी को आधार मानकर

जीने की फिर जुगत करें

इसे कोई भी नाम देकर।