मैं किसान हूं
अन्नदाता कहलाता हूं
अथक परिश्रम कर फसलें उगाता हूं
बदले में क्या पाता हूं?
बिजली, खाद, डीजल,श्रम
धूप और बारिश, अनिश्चित सा मौसम
लागत से भाव मिला करता है कम
सारी आपदाएं चुपचाप झेल जाता हूं।
किससे क्या कहना
अच्छा है मौन रहना
भाग्य का पता नहीं कर्म ही है करना
बच्चे विमुख हो गए हैं खेती में मन ना
मैं क्या कर डालूं विकल्प नहीं पाता हूं।
सबके सब छलते हैं
शोषक बन चलते हैं
खून और पसीने की कमाई पर पलते हैं
जय किसान कह कर फूलते और फलते हैं
मैं तो बस सदियों से सहता चला आता हूं।


