कालचक्र निरन्तर गतिमान रहता है। लोग इसे उपेक्षित करने का दुस्साहस करते हैं और स्वय॔ को ही छला करते हैं। बड़े बड़े शूरवीर आए और गए। किसी की एक न चली। कोई नहीं बच पाया।
'भिल्लन लूटी गोपिका वोइ अर्जुन वोइ बान '।धनुर्विद्या में पार॔गत अर्जुन के सामने ही भील गोपिकाओं को लूट कर ले गए और अर्जुन कुछ न कर सके। अनेक यशस्वीजन पराजित और लांछित हुए।
'सामान सौ बरस का पल की खबर नहीं'।
कोई दावा करता है कि अगले पचास वर्षों तक उसी की हुकूमत रहेगी। यह आत्मप्रव॔चना नहीं तो और क्या है!कब पांसा पलट जाए और लेने के देने पड़ जाएं- कौन जानता है!अति आत्मविश्वास
दुख और पछतावे का कारण बन जाता है। ऐसे लोगों को जानकारी होनी चाहिए
कि 'समय होत बलवान '।
जो बलशाली अपने धन बल,जन बल और बाहुबल पर इतराते हैं वे औरों को
तुच्छ और नगण्य शमझने लग जाते हैं।
यहीं से उनका पतन आरम्भ हो जाता है।
'सबै दिन होत न एक समान '।
'चक्रवत् परिवर्तन्ते सुखानि च दुखानि च'। जो व॔चित,उपेक्षित और पीड़ित हैं- उनके भी अच्छे दिन आएंगे। नीरज जी लिख गए हैं- काल का पहिया घूमे रे भइया। अस्तु;'नर हो न निराश करो मन को'।
