ज़िन्दगी इक तल्ख लम्हे सी
धूसर शाम के जैसी
जो उदासी के दरिया से
चुपचाप नहा कर निकली और जा बैठी है
बुझते अलाव के दर पर
तपिश की आस लिए
पर वहां है राख का बिखराव
बुझ चुके कोयले ही बाकी हैं
यह जताने को कि कोई वक्त, वक्फा था
यहां जब आग थी जलती निरन्तर।
ज़िन्दगी इक तल्ख लम्हे सी
धूसर शाम के जैसी
जो उदासी के दरिया से
चुपचाप नहा कर निकली और जा बैठी है
बुझते अलाव के दर पर
तपिश की आस लिए
पर वहां है राख का बिखराव
बुझ चुके कोयले ही बाकी हैं
यह जताने को कि कोई वक्त, वक्फा था
यहां जब आग थी जलती निरन्तर।