शाॅवर से झरती 

रूई के फाहों सी बूंदें

तनमन गुदगुदा गईं 

मन की तर॔गें 

जलप्रलय तक जा पहुंचीं 

याद आईं महाकवि प्रसाद की प॔क्तियां

'हिमगिरि के उत्तुंग शिखर पर.......'

भीगे नयनों से उस पुरुष ने 

क्या नहीं देखा!

चेतना वर्तमान में लेकर आई 

सुनामी की भयावह तस्वीरें 

जब सागर पूरे वेग से 

तहस-नहस करता,

सीमाओं को तोड़ता 

तटीय,नगरीय आबादी को 

बर्बाद कर गया था। 

नदियों में सालाना बाढ़ 

आती ही रहती है 

गोव॔श इत्यादि केसाथ 

जनहानि भी हुआ करती है 

लोग फिर नए सिरे से 

जीवन यापन की जुगत में 

जुट जाते हैं। 

तालाबों और तरणताल में 

ह॔सी ठिठोली और किलकारियां 

त्रासदी को भुलावा देती हैं। 

कुंए अब भी हैं गांवों और कस्बों में 

इनका शीतल जल 

तृप्तिदायक होता है 

कुंए में कूद कर जान देना 

अब बहुत कम हो गया है 

हां,नहरें अब भी सिंचाई करने 

साथ ही बहाने के काम आती हैं। 

नगरों में नाले हैं,नाली है,नल हैं 

नल पनघट नहीं बन सकते 

अब गागरें मिट्टी नहीं धातु से बनती हैं 

इसलिए क॔करी से गगरी नहीं फूटती ।

आर ओ से एक गिलास पानी पीता हूं

जल के जलवे को विराम।