कई दिन बीत गए थे। चुड़ैल उदास थी। वो शिकायत भरी नजर से भूत को देख रही थी ।उसे शहर शहर घूमने का चस्का लग चुका था। भूत सब कुछ अच्छी तरह समझ रहा था।उसका मन भी अब ऊबने लगा था। वह सोच रहा था कि इस बार चुड़ैल को लेकर कहां जाए। 


निश्चय करते हुए भूत ने उससे कहा कि इस बार दिल्ली चलते हैं। चुड़ैल बहुत खुश हुई। इस दफे विमान यात्रा का कार्यक्रम बना। दोनों काॅकपिट में घुस गए। पाइलट आए और समय होते ही विमान अपनी म॔जिल की ओर उड़ चला। ऊंचाई से बड़ा ही मनोरम दृश्य था। 


दिल्ली पहुंचकर दोनों आसमान में उड़ने लगे। किन्तु यह क्या!हर ओर धुआं था। पता चला कि यह वाहनों और पराली जलाने के कारण था। अंततः वे कुतुबमीनार की सबसे ऊंची जगह पर जा बैठे। थोड़ी ही देर में वे लाल किले पर थे। चांदनी चौक का नजारा करने के बाद वे स॔सद भवन गए जो सत्रावसान के कारण सूना सा था। 


सेंट्रल विस्टा बन रहा था। मेट्रो ट्रेन वे देख ही चुके थे। बाजार देखने गए जहां रौनक लौट रही थी। लोग जीवन यापन के हेतु स॔घर्ष करने लगे थे। उदासी,किन्तु स्थायी भाव बन चुका था। सभी राजनीतिक दल व्यस्त थे। पार्टी कार्यालयों में चहल-पहल थी क्योंकि चुनाव आसन्न थे। 


कुछ खास मजा नहीं आ रहा था। दोनों आगरा की तरफ निकल लिए। वहां जाकर किला और विश्वप्रसिद्ध कृति ताजमहल को देखा। दोनों का मन भर गया था। वे वापस चल पड़े। दोनों चुप थे। मन में ढेर सारी बातें चल रही धीं। बोलने का मन नहीं हो रहा था। और पीपल आ गया।