भोर हुई पर नींद न आई

सुबह बड़ी अलसाई।

पोर पोर में पीड़ा पसरी

पलक झपक न पाई।

नीरव राका, चांद अकेला

श्वेत श्याम मेघों की माला

सदा मेरे मन भाई।

बस चुपचाप देखना अम्बर

कालावधि जी लेना जी भर

प्रति पल है सुखदाई ।

दिन का सोना रात जागना

जग की नित्य असहमति होना

क्यों हो चिन्ता भाई।

भोर हुई पर नींद न आई।